इस्लाम में दिखावा एक गंभीर गुनाह
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
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इस्लाम में दिखावा एक गंभीर गुनाह
इन तीनों अहम इबादतों में दिखावा किस तरह नुकसान पहुंचाता है:1. हज और उमराह में दिखावा (Riya in Hajj & Umrah)आजकल सोशल मीडिया के दौर में हज और उमराह के दौरान दिखावा एक बड़ी चुनौती बन गया है।
नियत का बदलना: हज इस्लाम का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि कोई व्यक्ति इसलिए हज या उमराह पर जाता है ताकि समाज में उसे 'हाजी साहब' 'शेख साहब' कहा जाए या उसकी इज़्ज़त बढ़े, तो उसकी यात्रा आध्यात्मिक न रहकर सिर्फ एक पर्यटन बनकर रह जाती है।
सोशल मीडिया और रील्स: काबा के सामने दुआ मांगने के बजाय कैमरे की तरफ देखना, हर एक अरकान (रस्म) की तस्वीरें पोस्ट करना और लोगों से तारीफ बटोरना 'रिया' (दिखावा) के दायरे में आ सकता है। इससे इबादत का असल मक़सद (अल्लाह की याद) खत्म हो जाता है।
हदीस का हवाला: पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने दुआ फरमाई थी: "ऐ अल्लाह, मुझे ऐसा हज नसीब फरमा जिसमें न दिखावा (रिया) हो और न ही शोहरत की चाह।
कुर्बानी में दिखावा : कुर्बानी हजरत इब्राहिम (अलैहि.) की सुन्नत है और अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इसमें दिखावा सबसे ज्यादा देखा जाता है, अक्सर लोग सबसे महंगा, सबसे बड़ा या खास नस्ल का जानवर सिर्फ इसलिए खरीदते हैं ताकि समाज में उनकी अमीरी का रोब जमे। दूसरों के सामने अपने जानवर की कीमत बढ़ा-चढ़ाकर बताना शुद्ध रूप से दिखावा है।
कुरान की साफ हिदायत: सूरह अल-हज (आयत 37) में अल्लाह साफ़ फरमाता है: "अल्लाह को न तो उनका (कुर्बानी के जानवरों का) गोश्त पहुंचता है और न उनका खून, बल्कि उसे तो तुम्हारा तक़वा (मन का परहेज़गार भाव/नियत) पहुंचता है।"गोश्त बांटने में दिखावा: गरीबों को गुप्त रूप से देने के बजाय इस तरह देना कि दुनिया देखे, या सिर्फ रसूखदार लोगों में ही गोश्त बांटना ताकि संबंध बेहतर हों, कुर्बानी के असल उद्देश्य को ठेस पहुंचाता है।
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