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सवाल से डरी सत्ता, पत्रकार को पीटा

सवाल से डरी सत्ता, पत्रकार को पीटा

           प्रेस की स्वतंत्रता पर उठते सवाल
  
डेस्क रिपोर्ट। पत्रकारों का काम ही सवाल पूछना है, लेकिन जब सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछने के बाद हिरासत, गिरफ्तारी या कार्रवाई जैसी खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

जानकारी के अनुसार शाहीन खान, नफ़ीसा खान और हुदा जरीवाला से जुड़े मामलों को लेकर सामने आए आरोपों ने इसी बहस को फिर तेज कर दिया है। बताया जा रहा है कि 3 सितंबर को दिल्ली में मुख्यमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश के दौरान महिला पत्रकार शाहीन खान और नफ़ीसा खान को पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर साकेत थाने ले जाया गया। दोनों की ओर से मारपीट, गाली-गलौज और धमकी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। शिकायत पर कार्रवाई हुई या नहीं, इस पर भी संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

दूसरी तरफ पूर्व BBC Hindi पत्रकार हुदा जरीवाला की सहारनपुर मस्जिद विवाद और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को लेकर की गई कथित टिप्पणियों के बाद गिरफ्तारी की खबर सामने आई है। यहां भी सवाल सिर्फ किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि यह है कि पत्रकारों और नागरिकों को सत्ता से सवाल पूछने की कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, नीतियों पर सवाल उठाना और प्रशासन से जवाब मांगना एक महत्वपूर्ण अधिकार है। लेकिन साथ ही कानून और जांच की प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है। इसलिए किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए। अगर कोई पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता है, तो क्या उसके सवाल का जवाब कार्रवाई से नहीं बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए?

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