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ज़रा याद करो इनकी कुर्बानी.....

ज़रा याद करो इनकी कुर्बानी.....

        इस शख्सियत को भुला न पाओगे
डेस्क रिपोर्ट। जंग-ए-आज़ादी की सबसे बड़ी तहरीकों में से एक रेशमी रुमाल तहरीक शुरू करने वाले, अंग्रेज़ हुकूमत की नींद हराम कर देने वाले, इल्म, सब्र और कुर्बानी की मिसाल मौलाना महमूद हसन रहमतुल्लाह अलैह… जिन्हें दुनिया शैखुल हिंद के नाम से जानती है… आज हमारी नई नस्ल उनके नाम से भी अनजान है।

यह वही बुज़ुर्ग हैं जिन्होंने उस दौर में अंग्रेज़ी सल्तनत को खुला चैलेंज दिया, जब अंग्रेज़ों का नाम सुनकर बड़े-बड़े लोग कांप जाया करते थे। जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था… तब इस दरवेश ने मस्जिदों, मदरसों और खानकाहों से आज़ादी की आवाज़ बुलंद की।
उन्होंने सिर्फ तकरीरें नहीं कीं… बल्कि एक ऐसी गुप्त तहरीक चलाई जिसे इतिहास में रेशमी रुमाल तहरीक कहा जाता है। इस तहरीक में आज़ादी के पैग़ाम रेशमी कपड़ों पर लिखकर एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाते थे… ताकि अंग्रेज़ों को भनक तक न लगे।

सोचिए… उस दौर में जब न मोबाइल था, न इंटरनेट, न कोई सोशल मीडिया… तब यह लोग अपनी जान हथेली पर रखकर मुल्क की आज़ादी के लिए काम कर रहे थे। जब अंग्रेज़ों को इस तहरीक का पता चला… तो मौलाना महमूद हसन को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें माल्टा की जेल भेज दिया गया… जहाँ उन्होंने कई साल कैद की सख्तियां झेलीं। लेकिन न उनके हौसले टूटे… न इरादे बदले… न जुबान से अंग्रेज़ों के लिए माफी निकली।

जेल की सलाखों के पीछे भी उनका दिल सिर्फ एक ही चीज़ के लिए धड़कता रहा… हिंदुस्तान की आज़ादी। रिहा होकर जब वापस लौटे… तो आराम नहीं किया… बल्कि फिर से कौम को जगाना शुरू किया। उन्होंने लोगों को बताया कि अगर जिंदा रहना है… तो इल्म हासिल करो… एक हो जाओ… और गुलामी की जंजीरें तोड़ दो।
मौलाना महमूद हसन वही शख्सियत हैं जिनके शागिर्दों ने आगे चलकर पूरे हिंदुस्तान में इल्म और आज़ादी की मशाल जलाई। उनके असर से हजारों नौजवान उठ खड़े हुए।

आज अफसोस की बात यह है… जिन लोगों ने अपनी जिंदगी, अपना आराम, अपनी जवानी और अपना सब कुछ इस मुल्क और उम्मत के लिए कुर्बान कर दिया… आज हम उनकी कब्रों तक को नहीं जानते। हम नई-नई हस्तियों को याद रखते हैं… लेकिन अपने असल हीरो भूल चुके हैं। याद रखिए… जो कौमें अपने मुहसिनों को भूल जाती हैं… उनका इतिहास भी उन्हें भूल जाता है।

यह थे शैखुल हिंद मौलाना महमूद हसन रहमतुल्लाह अलैह… एक आलिम, एक मुजाहिद, एक रहबर… और आज़ादी के ऐसे सिपाही… जिनका नाम सुनकर अंग्रेज़ हुकूमत घबरा जाती थी। अगर आप भी चाहते हैं कि हमारी नई नस्ल अपने असली हीरोज़ को पहचाने… तो इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें… ताकि लोग जान सकें… कि आज़ादी हमें यूँ ही नहीं मिली थी।

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