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वक्फ बोर्ड में हुए बदलाव से समुदाय के..??

वक्फ बोर्ड में हुए बदलाव से समुदाय के..??

 वक्फ बोर्ड में हुए बदलाव से समुदाय के..??
डेस्क रिपोर्ट। मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में हुए बदलाव ने पुरे मुस्लिम कौम को  चिंता में डाल दिया है। वक्फ बिल 2025 बनने के बाद पहली बार वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति की गई है और एक सक्रिय बीजेपी नेता को फिर अध्यक्ष बनाया गया है। बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि  क्या यह एक सिर्फ मामूली प्रशासनिक बदलाव है, या फिर वक्फ बोर्ड की  घार्मिक पाकिज़गी  को प्रभावित और ख़तम करने की दिशा में एक नया नापाक कदम है ?

वक्फ केवल ज़मीन या इमारतों का मामला नहीं है। यह हमारी मस्जिदों, कब्रिस्तानों, मदरसों, इमामबड़ों, दरगाहों और हमारी धार्मिक विरासत से जुड़ा एक अहम इदारा है। इसलिए इसके बुन्यादी वजूद और मजहबी स्ट्रक्चर में बदलाव से मुस्लिम समाज में उसके वजूद को लेकर डर और भय का होना और इसकी फ़िक्र लाज़मी है।

अगर आज इस तरह का बदलाव एक राज्य में हो रही हैं, तो  कल यह दूसरे राज्यों में भी देखने को मिलेगा।  क्या इससे अल्पसंख्यक यानी मुसलमानों के फंडामेन्टल राईट को नहीं छिना जा रहा है? आने वाले दिनों में वक्फ बोर्डों की स्वतंत्रता और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर असर नहीं पड़ेगा? ये सवाल आज हर जागरूक मुसलमान के मन में हैं।

इस गलत परम्परा का खुल कर विरोध करना चाहिए ओर हो भी रहा हे, अगर सरकार ने ग़लत नियत से कोई क़ानून वक्फ पर बना भी लिया है तो क्या, संविधान ने हमें अपने धर्मिक संस्थाओँ के बनाने, रखने उसे संचालित करने और देखभाल करने का अधिकार दिया है। संविधान और कानून के दायरे में रहकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। अपनी धार्मिक संस्थाओं और अधिकारों के प्रति एकजुट होकर और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना आज पहले से कहीं अधिक ज़रूरी है।

भोपाल में विभिन्न मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारियों और सदस्यों ने प्रदर्शन किया हे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जिस तरह हिंदू मंदिर ट्रस्टों में मुस्लिमों को सदस्य नहीं बनाया जाता, उसी तरह वक्फ बोर्ड में भी हिंदू सदस्यों की नियुक्ति नहीं की जानी चाहिए।  सरकार की “नियुक्ति” और उसकी असली “नियत” के बीच के बुनियादी अंतर को उजागर करती है। वक्फ पूरी तरह से एक धार्मिक और अहस्तांतरित (दान) व्यवस्था है, जो इस्लामी शरिया और अकीदे (आस्था) के तहत काम करती है। इसमें गैर-मुस्लिमों को शामिल करना इसके मूल स्वरूप को बदलना है।

 क्या सरकार इसी तरह की ‘पारदर्शिता’ और ‘समावेशिता’ की नीति अन्य धार्मिक ट्रस्टों जैसे—देवस्थानम बोर्ड, तिरुपति देवस्थानम, या सिखों की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) में भी लागू करेगी? क्या वहां किसी मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यक सदस्य की नियुक्ति की जा सकती है? अगर नहीं, तो केवल वक्फ बोर्ड को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?

सरकार की नियत वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन सुधारना नहीं, बल्कि उन पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करना है। वक्फ संपत्तियां मुसलमानों द्वारा खुदा की राह में दान की गई निजी संपत्तियां हैं, न कि सरकारी जमीनें।
“वक्फ बोर्ड में की गई इन नियुक्तियों से सरकार की यह नियत साफ दिखाई देती है कि वह स्वायत्त धार्मिक संस्थाओं के संचालन तंत्र को राजनीतिक रूप से प्रभावित करना चाहती है। यह कदम समुदाय के संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों पर सीधा कुठाराघात है।”





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